Thursday, May 23, 2019

नीतीश कुमार फैक्टर भले ग़ायब हो लेकिन उनके वोटबैंक से ही तय होगा बिहार का नतीजा

बिहार की 40 सीटों को लेकर जो एग्ज़िट पोल के नतीजे बता रहे हैं अगर वो असल नतीजे में तब्दील हो जाते हैं तो इसका सबसे बड़ा सियासी फ़ायदा नीतीश कुमार को होगा और अगर नतीजे एग्ज़िट पोल के परिणाम के उलट होते हैं तो फिर सबसे ज़्यादा नुकसान भी नीतीश कुमार को ही होना है.
ये स्थिति तब है जब 2014 से पहले प्रधानमंत्री पद के दावेदारों में शुमार नीतीश कुमार अब महज नरेंद्र मोदी-अमित शाह की अगुवाई वाली बीजेपी के एक सहयोगी भर हैं और इस बार बिहार के चुनाव में उनका अपना काम और सुशासन बाबू की छवि कहीं नजर नहीं आई. नीतीश कुमार खुद नरेंद्र मोदी को दोबारा प्रधानमंत्री बनाने के नाम पर वोट मांगते नजर आए.
राष्ट्रीय जनता दल के उपाध्यक्ष और वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी बताते हैं, "पहले तो बिहार में कहा जा रहा था कि देश भर में मोदी के नाम पर वोट मांगे जाएंगे लेकिन बिहार में चेहरा नीतीश कुमार होंगे. पहले एकाध चरण में तो नीतीश ने मोदी का नाम नहीं लिया लेकिन हालात का अंदाज़ा होने के बाद वे अपनी सभाओं में मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के नाम पर वोट मांगने लगे."
चुनावी अभियान के दौरान राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव ने इस बात को भी मुद्दा बनाया कि नीतीश कुमार अपनी पार्टी का चुनावी घोषणा पत्र तक जारी नहीं कर पाए. इस बात की चर्चा भी होती रही कि बीजेपी के दबाव के चलते जदयू अपना घोषणा पत्र जारी नहीं कर सकी.
तेजस्वी यादव ने अपने पूरे चुनावी अभियान में जितना बीजेपी को टारगेट किया उससे कहीं ज़्यादा उन्होंने नीतीश कुमार को निशाने पर लिया और उन्हें 'पलटू चाचा' कह कर जनादेश का अपमान करने वाला नेता बताया.
तेजस्वी कहते हैं, "नीतीश चाचा जो बात कहते थे, उस सबसे पलट गए हैं, ये बिहार की जनता देख रही है. वे कहते थे मिट जाएंगे लेकिन मिलेंगे नहीं, आप देखिए क्या स्थिति है. कहते थे कि राजनीति लोक-लाज से चलने वाली चीज है लेकिन जनादेश का ऐसा अपमान किसने किया होगा. इतना ही नहीं वे बीजेपी का फुल फॉर्म बताते थे बड़का झुट्ठा पार्टी."
इस पूरे चुनावी अभियान के दौरान नीतीश कुमार ने मीडिया से कोई बातचीत नहीं की. उनकी पार्टी से जुड़े कई लोगों ने बताया कि मौजूदा परिस्थितियों में नीतीश कुमार मीडिया से बातचीत के लिए खुद को सहज नहीं पा रहे हैं, इसलिए बच रहे हैं.
हालांकि चुनाव निपटने के बाद नीतीश कुमार मीडिया के सामने आकर बोले कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनेगी और वो नई दिल्ली में एनडीए की बैठक में भी शरीक होने पहुंचे.
शिवानंद तिवारी कहते हैं कि कभी विपक्ष की ओर से संभावित सबसे बड़े पद का दावेदार होने वाले नेता के लिए यह पतन नहीं तो क्या है.
दरअसल बिहार की राजनीति को 2014 के आम चुनाव के नतीजों के परिप्रेक्ष्य में देखें तो उस वक्त बीजेपी, राम विलास पासवान की एलजेपी और उपेंद्र कुशवाहा की आरएलएसपी के साथ चुनाव मैदान में थी, जबकि राष्ट्रीय जनता दल-कांग्रेस के गठबंधन और जनता दल (यूनाइटेड) ने अलग अलग चुनाव लड़ा था.
उस चुनाव में बीजेपी को करीब 29.9 फ़ीसदी वोट मिले थे. जबकि एलजेपी को 6.5 फ़ीसदी वोट मिले थे. वहीं राष्ट्रीय जनता दल को 20.5 फीसदी वोट मिले थे, जबकि कांग्रेस को 8.6 फीसदी वोट मिले थे.
उस चुनाव में नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड को 16 फ़ीसदी वोट मिले थे. इतने वोट बैंक के साथ नीतीश कुमार खुद एक राजनीतिक ताकत तो नहीं हो सकते लेकिन उनका साथ चाहे वो बीजेपी के साथ हो या फिर आरजेडी के साथ उसे निर्णायक बढ़त दिलाने का दम रखते हैं.
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या 2019 में नीतीश कुमार अपना वोटबैंक सुरक्षित रख पाए हैं?
जनता दल यूनाइटेड के प्रवक्ता राजीव रंजन बताते हैं, "इस बार हम लोगों को वोट बैंक बढ़ा ही है कम नहीं हुआ है, हमें कई इलाकों से मुसलमानों का समर्थन मिलने की उम्मीद है."
दरअसल, नीतीश कुमार ने 2005 से पहले बिहार के अत्यंत पिछड़े समुदाय और दलितों का एक बड़ा वोट बैंक एकजुट करने में कामयाबी हासिल की थी.
नीतीश कुमार अपने इस वोट बैंक को लेकर कितने सजग हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वे जब भी अपनी पार्टी के पदाधिकारियों से मिलते हैं या फिर भरोसेमंद अफसरों को दिशा निर्देश दे रहे होते हैं, तो हमेशा याद दिलाते हैं कि बिहार के अत्यंत पिछड़े समुदाय का ख्याल रखिए.
नीतीश कई बार ये भी कहते हैं कि आप लोगों को मालूम भी है कि इनकी आबादी बिहार की कुल आबादी की एक तिहाई है, हालांकि यह अभी तक रहस्य ही है कि इस वर्ग की आबादी का हिस्सा कितना है.
लेकिन एक मोटा आकलन यह बताता है कि बिहार की आबादी में करीब एक चौथाई आबादी इसी वर्ग की है, इसमें करीब सौ जातियों का समूह है, जिसे नीतीश कुमार ने साधकर ना केवल एकजुट किया बल्कि बीते 14 सालों से बिहार की सत्ता पर इनकी मदद से काबिज रहे.
चाहे वो 2005 रहा हो या फिर 2010 या फिर महागठबंधन के साथ मिलकर 2015 का ही चुनाव रहा हो, महादलितों का साथ नीतीश कुमार को मिलता रहा. 2009 के आम चुनाव में बीजेपी के साथ तो नीतीश कुमार की पार्टी 20 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल करने में कामयाब हुए थे. 2013 में वे बीजेपी से अलग हुए, वो भी नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने के बाद. 2014 के चुनाव में उनकी पार्टी को वोट ज़रूर मिला लेकिन वे महज दो सीटों तक सिमट गई.
इसके बाद ही नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद यादव से हाथ मिलाया और 2015 में दोनों का महागठबंधन कामयाब रहा था. तब राष्ट्रीय जनता दल 80 सीटों के साथ बड़ी पार्टी रही थी और जनता दल यूनाइटेड को 71 सीटें मिली थीं. इस प्रयोग के बारे में राजीव रंजन कहते हैं, "तब नीतीश जी की बदौलत ही लालू जी की पार्टी की वापसी हुई थी. हमारी सीटें भी बेहतर होतीं लेकिन कुछ सीटों पर हमें भीतरघात का सामना करना पड़ा था. नहीं तो हमारा स्ट्राइक रेट बेहतर होता."
शिवानंद तिवारी कहते हैं, "नीतीश कुमार कभी लालू के कद के नेता नहीं बन पाए. लालू मास अपील वाले नेता हैं. नीतीश का उतना अपील कभी नहीं रहा. यही बात नीतीश कुमार को जब तब अखरती रही है. महागठबंधन के टूटने की वजह नीतीश की अपनी यही बैचेनी थी. आप इसे ऐसे भी समझिए कि नीतीश के जूनियर हैं सुशील मोदी जो इनसे अभिभूत रहते रहे हैं. तो दोनों का साथ स्वाभाविक है क्योंकि वहां नीतीश को कोई चुनौती नहीं मिल पाती है."

Thursday, January 31, 2019

لماذا اضطررت إلى مغادرة السعودية؟

في أكتوبر/تشرين الأول 2018، طُلب مني مغادرة المملكة العربية السعودية: البلاد التي ولدت فيها والمكان الذي كنت أعتقد أنني قد أكون قادرة على بناء حياة جديدة فيه. لقد استرق البعض السمع إلى وأنا أناقش مقالا عن الناشطات النسويات اللائي اعتقلن في السعودية بينما كنت أصور فيلما وثائقيا لبي بي سي عن محاولتي اكتشاف إمكانية استقراري بالمملكة.
كان علي مغادرة البلاد فورا وأُبلغت بأن سلوكي، على ما يبدو، "مُنتقد للمملكة".
في تلك اللحظة، كان الشيء الوحيد الذي شعرت به هو الصدمة. كل ما فعلته قراءة مقال - في الواقع. شعرت أنني تعرضت لتوبيخ وطُلب مني عدم الحديث عن الناشطات المشاركات في حملة منح المرأة حق قيادة السيارات.
ثم بدأ القلق والخوف. بدأت أشك في نفسي، ربما أكون فعلت شيئا فظيعا حقا! جرى كل شيء بسرعة ولم يكن لدي وقت للتفكير.
فكرت لو أنني جرؤت على البقاء، قد يلغون تأشيرة دخولي إلى البلاد، فحجزت رحلة طائرة متجهة إلى مطار هيثرو ووصلت إلى لندن في اليوم نفسه.
لقد مضت 25 سنة على الفترة التي عشت فيها طفلة في السعودية، وعندما عدت إليها العام الماضي، اندهشت كيف بُنيت: كان فيها شواطئ ومراكز تسوق (مولات) ومطاعم راقية. وخلال الأيام الستة التي قضيتها في البلاد سقط المطر بغزارة، وهو حدث نادر جدا دفعنا للتندر: بأنني جلبت معي مطر لندن.
إن ذكرياتي المبكرة عن المملكة ضبابية. فقد ولدت هناك في عام 1989، وعشت في العاصمة، الرياض، مع والدي السودانيين. كانا التقيا في الجامعة في مصر ثم انتقلا إلى السعودية عندما حصل والدي، الطبيب، على عرض للعمل هناك.
بعد سنوات قليلة، حصل والدي على موقع عمل جديد، هذه المرة في إيرلندا الشمالية، فانتقلنا ثانية وكان عمري ثلاث سنوات.
لم تكن تلك نهاية رحلاتي. فقد بقينا في إيرلندا الشمالية حتى بلغت سن الـ 13 فانتقلنا إلى اسكتلندا حيث عشت حتى بلوغي العشرين. ذهبت بعدها إلى نيويورك لمدة ستة أشهر للعمل في العلاقات العامة في مجال الأزياء، وبلغت 21 من العمر فعدت ثانية إلى لندن للعمل كمصممة أزياء.
عندما تتنقل كثيرا، لا تمتلك إحساسا مجسدا أين يكون موطنك. وهذا قد يكون نعمة أو نقمة، إذ يمكنك أن تجعل أي مكان موطنا لك، أو قد لا تشعر بالوطن في أي مكان. وأنا أقرب إلى الشعور الأول، كل هذه التنقلات جعلتني أكثر مرونة على تقبل الناس الجُدد والأوضاع الجديدة. ولدي الآن أصدقاء في جميع أنحاء العالم.
قادني حبي للتواصل مع الناس إلى الشروع في إنشاء مدونة على الانترنت ضمت مقابلات مصورة مع نساء ملونات للحديث عن تجاربهن في العمل في صناعة الأزياء. وخلال هذا الوقت، كنت اختبر نفسي - محاولة باستمرار أن أجد أين سيكون المكان المناسب لي ومن أين نبعت هويتي. وعند العمل في الأزياء تُفكر كثيرا في كيفية تمثيل نفسك وتحديد من أنت؟
وبوصفي امرأة سودانية عاشت في الشرق الأوسط والغرب، لم أكن متأكدة من المكان الذي أعود إليه. لقد دفعني الانتقال إلى لندن، حيث أُحطت بالعديد من الناس الذين لديهم هويات قوية (راسخة) ويفخرون بالأمكنة التي جاءوا منها، إلى الرغبة في فهم نفسي أكثر.
لقد أدركت أنني إذا أردت تحديد من أنا حقا (أو من كنت)، فإن علي الرجوع إلى البداية والعودة إلى السعودية، البلاد التي مازالت ثلاث من عماتي يعشن فيها.
ثمة كمية هائلة من الكتابات الصحفية السلبية عن تلك البلاد، لكنني لن أعرف حقيقتها ما لم أذهب إلى هناك بنفسي.
أردت أن أصهر هذه الرحلة مع جانب آخر من عرضي لهويتي. ففي المدرسة في اسكتلندا، كتب أصدقائي عني أنني "أقرب لأن أكون مقدمة لبرنامج بلو بيتر" فمنذ صغري كنت اسأل أسئلة باستمرار.
وفي عمر 27 عاما، أعددت عرضا يتضمن مقاطع من مدونتي المصورة (تضم مقاطع فيديو) عن الأزياء، وراسلت شركات إنتاج طالبة دعمهم لعمل فيلم وثائقي عن عودتي إلى السعودية. ولحسن الحظ ردت واحدة من الشركات بالإيجاب، وبعد سنتين من التخطيط بتنا المخرجة جيس وأنا جاهزتين للذهاب.
لم أكن أبدا اعتزم الذهاب إلى الشرق الأوسط لفعل أي شيء ينطوي على مخاطرة. كان هدفي رؤية إمكانية العيش في السعودية كامرأة شابة تحمل قيما خليطة من الثقافتين الغربية والعربية. أردت أن أفعل أشياء يومية هناك، من أمثال الذهاب لشراء الطعام ولقاء الأصدقاء.
اليوم، بعد أن رفعت السعودية الحظر المفروض على قيادة النساء للسيارات، أردت أن أجلس وراء عجلة القيادة واستفيد من تلك الحرية الجديدة.
بالطبع، أعرف أن الاشياء تتم بشكل مختلف هناك. فللنساء حقوق أقل، على سبيل المثال، لا يمكن للنساء مغادرة البلاد من دون موافقة الرجل (ولي الأمر)، ولا يمكن لهن امتلاك حساب مصرفي من دون موافقته، فضلا عن جلوسهن في مناطق منفصلة بعيدا عن الرجال في المطاعم.
وعلى الرغم من هذه القيود، فإن البلاد تتغير. يمكن للنساء الآن التجول من دون وضع النقاب، ويمكنهن أن يعشن حياة اجتماعية بحرية أكبر وأن تكون لديهن حياتهن المهنية، بيد أن المملكة مازالت تحتفظ بقبضة مشددة على رعاياها وتسارع للقضاء على أي معارضة.
وقبل مغادرتي بريطانيا في أكتوبر/تشرين الأول العام الماضي، كان لدي بعض الأفكار عن كيفية معاملة السعودية لخصومها. ففي الثاني من الشهر نفسه، انتشر خبر جمال خاشقجي، الصحفي والمنشق السعودي، الذي اختفى في القنصلية السعودية في اسطنبول، وتوضح لاحقا أنه قد قتل.
وعلى الرغم من هول هذه القضية، لم أكن خائفة. لم أذهب إلى السعودية كصحفية. كنت صانعة أفلام ذاهبة لزيارة عائلتي. على الرغم من أنني عندما هبطت في مدينة جدة لبدء زيارتي للمملكة لمدة أسبوعين، فكرت مع نفسي : "ماذا فعلت؟" ولكن حالما التقيت بعماتي الثلاث شعرت بالأمان.